About Me

My Photo
delhi, India
I m a prsn who is positive abt evry aspect of life. There are many thngs I like 2 do, 2 see N 2 experience. I like 2 read,2 write;2 think,2 dream;2 talk, 2 listen. I like to see d sunrise in the mrng, I like 2 see d moonlight at ngt; I like 2 feel the music flowing on my face. I like 2 look at d clouds in the sky with a blank mind, I like 2 do thought exprimnt when I cannot sleep in the middle of the ngt. I like flowers in spring, rain in summer, leaves in autumn, freezy breez in winter. I like 2 be alone. that’s me

Saturday, February 9, 2013

....मुझे याद करोगे ना, इस रिश्‍ते पर नाज करोगे ना


खालीपन है, एकदम खाली...दिल, दिमाग और जिंदगी. इस खालीपन के साथ जिंदगी जीने की हर रोज एक नई कोशिश करती हूं और शाम होते-होते हार जाती हूं. क्‍या तुम भी ऐसी कोशिश कर रहे हो, क्‍या खालीपन तुम्‍हारे जेहन में भी दस्‍तक देता होगा? पता नहीं इतनी दूर हूं ना तुमसे अब....
अब तक तुम्‍हारे साथ थी लेकिन अभी तुम्‍हें जी रही हूं मै...हर दिन, हर घंटे, हर पल...कभी समझने का मौका ही नहीं मिला कि जिंदगी तुम्‍हारे बिना भी जीनी होगी, खुद को बहलाने के लिए हर खुशनुमा पल को याद करती हूं.
 तुम्‍हें याद है एक दिन रात खाने के बाद हम सब बैठे थे, हमारा सबसे अजीज Mr. K भी हमारे साथ ही था. बातों-बातों में उसने पूछा माही तुम्‍हें दोबारा जिंदगी मिली तो तुम्‍हें क्‍या चाहोगी? तुम मेरी ओर देखकर मुस्‍कुराए....यही सवाल उसने तुमसे भी पूछा....तुमने एकदम कॉरपोरेट जगत के किसी बड़े नाम की तरह एक जवाब दिया...अब बारी मेरी थी...Mr. K ने दो बार कहा, बोलो ना माही अल्‍लाहताला ने दोबारा इंसानी जिंदगी दी तो तुम क्‍या जीना चाहोगी.
.....और मै बोली....मै माही ही बनकर आना चाहूंगी, हर वो गलती दोबारा दोहराना चाहूंगी, तुम्‍हें इतना ही प्‍यार करूंगी, तुम्‍हारे साथ जिंदगीभर साथ रहने के लिए इसी तरह अल्‍लाह से लड़ूंगी, तुम्‍हारी हर छोटी-बड़ी बात का ख्‍याल रखूंगी, अपने मां-पापा की खिदमत करूंगी. मै तुमसे इसी तरह टूट कर प्‍यार करूंगी...जिंदगीभर, जिंदगी रहते तक और जिंदगी के बाद भी...इंशाल्‍लाह...ये सुनकर मेरा गला रूंध गया था...तुम दोनों की आंख भी नम थी.... Mr. K उठकर पानी लेने गए....तुम मेरे पास आए और पूछा इतना प्‍यार क्‍यों करती हो मुझसे...शायद तुम्‍हें कुछ नहीं दे पाऊंगा....
तुम्‍हारे ही ख्‍यालों से बात करते हुए उसी जगह आ खड़ी हूं जहां तुमने मुझे आखिरी बार छोड़ा था....न्‍यू फ्रेंड्स कॉलोनी का ये बस स्‍टैंड....तुम नहीं हो लेकिन मेरा दिल पूछना चाहता है तुमसे ''....मुझे याद करोगे ना, इस रिश्‍ते पर नाज करोगे ना?


रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ.......अहमद फ़राज़

Sunday, January 27, 2013

...क्‍यों मुमकिन न हो सका

clicked by: Mahi S

उन पांच दिनों की हर रात न जाने कैसी लग रही थी.....कभी ज़हन से नहीं जाएगी.....और क्यूँ नहीं रहेगी मेरी यादों में, आखिरी कुछ दिन जो थे तुम्हारे साथ, उस घर में, उसकी बालकनी में. मै बदहवास सी होकर पूरे घर में घूम रही थी. उसके हर कोने को छू रही थी. दोनों रो रोकर बेजार थे लेकिन कोई साथ में नहीं था, वक़्त ने तो साथ ना जाने कब से छोड़ दिया था. तुमने कहा माही यही वक़्त है, चलो सब भूल जाते हैं, किस्मत अपना फैसला सुना चुकी है पर ये कुछ वक्‍त हमारा है. इस पर तो खुदा का भी जोर नहीं....मेरे मन में आया खुदा? जाने कौन है ये खुदा?
हम दोनों हाल में बैठ गए, तुमने फिल्म बर्फी लगायी....हम दोनों फिल्‍म देखने लगे. खूबसूरत फिल्‍म, एक खूबसूरत संदेश लिए हुए. मोहब्‍बत का कोई मजहब, कोई भाषा नहीं होती. वो तो मोहब्‍बत है जिससे होती है बेलौस हो जाती है. लेकिन हम अलग हो रहे थे इसी मजहब के लिए....आखिरी कुछ पल एक दूसरे के साथ...
हम दोनों सिर्फ वो गाना सुनने के लिए पूरी फिल्‍म देख रहे थे.....सच बेहद खूबसूरत गाना.... 'इतनी सी हंसी..इतनी सी खुशी..इतना सा टुकड़ा चांद का.......वो गाना आया स्‍क्रीन पर, नहीं रोक पाई अपने आंसू, तुमने भी नहीं पोंछा आंसूओं को. तुम बोले जितना हो सके रो लो...मत रोको खुद को....
मैने तुमसे एक सवाल किया....जिस खुदा की तुम बात करते हो क्‍यों उन्‍होंने मेरी छोटी सी दुनिया को मुक्‍कमल नहीं किया? मैने तो एक दुनिया बनाई, मेरी दुनिया लेकिन क्‍यों आज मै तिनके भी समेट नहीं पा रही हूं, क्‍यों? क्‍यों मुमकिन नहीं हुआ जिंदगीभर एक दूसरे का साथ?

Sunday, December 23, 2012

आखिर नहीं लड़ पाई मै...


jodhpur, clicked by Mahi S
रास्‍ते शायद अगल हो चुके थे अब....दिल का पता नहीं...तुम्‍हारे दिल का!  कभी कुछ था भी या नहीं इस बात पर भी शक होता है. सब हिम्‍मत जुटाकर सिर्फ इतना बोल पाई कि ज्‍यादा से ज्‍यादा वक्‍त मेरे साथ रहो..क्‍या तुम इतना कर सकते हो मेरे लिए? हमेशा की तरह तुम्‍हारे पास मेरे लिए खामोशी ही थी...इस बार तुम्‍हारा जवाब जानना मुझे जरूरी नहीं लगा क्‍योंकि मेरा दिल मान चुका था मै अब जो कर रही हूं वो अपने लिए कर रही हूं. 
खराब तो था ही सब, लंबे समय से....साथ होकर भी अलग ही थे. लेकिन इस बार तुम्‍हें बताकर जयपुर आई थी मै. बोला था मैने इस बार बाहर चलेंगे कहीं. पता नहीं कितने समय बाद तुमने बात नहीं काटी थी मेरी. एक बार में ही कहा ठीक है, जोधपुर ले चलूंगा तुम्‍हें. मै हमेशा की तरह ऑफिस के बाद जयपुर के लिए निकली. रास्‍ते में तुमसे बात भी हुई लेकिन पता नहीं क्‍यों खालीपन लग रहा था मुझे....शायद मेरे मन का खलल था. तुमने कहा, 'मै तुम्‍हारे पहुंचने से पहले ही सिंधी कैंप पहुंच जाऊंगा.' मै अब भी सिर्फ तुम्‍हें स सुनना ही चाह रही थी, देखना चाहती थी क्‍या-क्‍या बोल सकते हो तुम.... 
मै सिंधी कैंप पहुंच गई थी, रात के साढ़े ग्‍यारह बजे थे. तुम पहले ही वहां थे, हाथ में जोधपुर की दो वॉल्‍वो की टिकट के साथ. तुम मेरी ओर बढ़े...मेरे हाथ में एक किताब थी...रविंदर सिंह की 'कैन लव हैपन ट्वाइस'... तुम पास आए...मुझे देखा, किताब को देखा...फिर बोले...'तुम्‍हे नहीं हो सकता'...तुम्‍हारी इस बात से मेरे चेहरे पर मुस्‍कुराहट तो आई लेकिन वो एक सवाल था, फिर भी तुमने मुझे.... 

clicked by Mahi S
तुम्‍हारे हाथ में कप नूडल था, तुमने मुझे दिया और बोले मुझे पता है तुमने रास्‍ते में कुछ नहीं खाया होगा..ये नूडल खा लो... तुम्‍हारी ये फिक्र देखकर मुझे अजीब लग रहा था. हम दोनों वॉल्‍वो में बैठ गए. पहली बार मै घर में जाने से पहले जयपुर से कहीं और के लिए निकली थी....छह घंटे के बाद जब आंख खुली तो एक और नया शहर हम दोनों का स्‍वागत कर रहा था.... जोधपुर की वो सुबह बहुत खास थी और मै तुम्‍हारे साथ....शायद और कुछ दिन के लिए...होटल के कमरे की खिड़की से जब पर्दा हटाया तो आंखों को एक सुकून मिला, नीला खुला आसमान और ऊंची पहाड़ी....मै अकेले खड़ी थी, हमेशा के लिए अकेले...सोच रही थी जिंदगी कैसी होगी तुम्‍हारे बिना...आखिर नहीं लड़ पाई ना नियति से ना ही तुमसे..... 

Wednesday, November 28, 2012

चल पड़ी थी फिर दूर कहीं...


clicked by Mr. S
अजीब खबर सुनने को मिली उस दिन, सुनकर अनसुना करना चाहा लेकिन शायद खबर सच थी.
तुम्‍हें फोन लगाना चाहती थी पर मैने नहीं किया. दोपहर को ही ऑफिस से निकल गई थी...दूर कहीं....कश्‍मकश थी मन में क्‍या बात करूं...क्‍या पूछूं तुमसे...अजीब सी दूरी महसूस हो रही थी तुमसे...पता नहीं कैसा अजनबी एहसास था तुम्‍हें लेकर...इतने सालों में पहली बार...
शाम को मैने फोन मिलाया तुम्‍हें, फोन उठाया तुमने लेकिन आवाज भी अपनी सी नहीं लग रही थी मुझे. पता नहीं क्‍या था...आखिर तुमसे पूछ ही लिया मैने...खामोशी थी फोन में...हम दोनों के दर्मियां भी था अजनबी एहसास और खामोशी. काफी देर बाद बस एक आवाज आई...'अब समझो माही'. तुम्‍हारा इतना कहना ही मेरा जवाब था..
कुछ नहीं बोली मै तुमसे...फोन रख दिया मैने. तुम वो थे ही नहीं जिसने मुझे माही बनाया...मै तो किसी अजनबी से बात कर रही थी. तुम अपना ले चुके थे, तुम्‍हारा फैसला था, मै कहीं नहीं थी उस फैसले में...अंगुलियों में दिन गिनने लगी थी, जेहन में एक ही बात आई 'ना जाने तुम्‍हारे साथ बिताने के लिए कितने दिन हैं मेरे पास'.
फोन लगातार बज रहा था....नहीं उठाना चाहती थी फोन...क्‍या सुनने के लिए उठाती कि अब रास्‍ते अलग होंगे...चल पड़ी थी फिर दूर कहीं...

Friday, November 16, 2012

खो गया अक्स, खो गए अलफ़ाज़

@ Bhangarh
मुझे याद आ रहा है, उस दिन जब तुम शाम को ऑफिस से लौटे थे और मै तुम्हे पानी देने के बाद दिन भर की साडी बातें तुम्हे एक ही सांस में बता रही थी। बिना तुम्हारी तरफ देखे, मै सिर्फ बोली जा रही थी। शौपिंग में आज इतना डिस्काउंट मिला, घर की साडी ग्रोसरी ललकार आई, एक लाल रंग का दुप्पटा लिया, ड्राईवर देर से आया, नीचे के फ्लैट में नयी फॅमिली आई है उनसे दोस्ती हुयी, उन्हें मैंने शाम को चाय पर बुलाया...तुम हमेशा की तरह मेरी बातें सुन रहे थे।
 मेरी बातों को बीच में रोकर तुमने मुझे एक कप चाय बनाने को कहा। मै चाय बनाने चली गयी, चाय लेकर आई तो तुम अख़बार लेकर बैठे थे, मै छह रही थी तुम मुझसे बात करो। मैंने तुम्हे बोला भी "क्या तुम चाय और अख़बार लेकर बैठ गए, मुझसे बात करो, सुनो न ठीक से मैंने पुरे दिन क्या किया।" पर तुम तो बस सिर हिलाकर जवाब दिया। मुझे अच्छा नही लगा, मै उठकर चली गयी। आईने के सामने मई तैयार हो रही थी, काजल उठाकर अभी लगा ही रही थी की आईने में तुम नज़र आये। मैंने भी तुम्हे अनदेखा किया और अपनी आँखों में काजल लगाने लगी। तुम मेरे करीब आये, मुझे धीरे से अपने पास खींचा, मैंने तुम्हारी तरफ नाराज़गी से देखा, फिर तुमने धीरे से मेरे कान में कहा "माही, तुम जब अपनी इन काजल वाली आँखों से मेरी तरफ देखती हो ना तो मुझे साडी बातें समझ आ जाती है...तुम्हारी बातें समझने के लिए मुझे अल्फाजों की ज़रूरत नहीं है। 


आज 
आज मै आईने के सामने हूँ, काजल लगा रही हूँ लेकिन आज मेरी आँखों की तारीफ करने के लिए ढूँढने पर भी तुम्हारा अक्स आईने में नज़र नहीं आ रहा है। काजल आज भी लगा रही हूँ.... क्यूंकि तुम्हे पसंद है मेरी काजल लगी आँखें....तारीफ करने के लिए तुम नहीं हो, लेकिन काजल से कह रही हूँ "मेरी आँखों में ऐसे रहना की किसी को मेरी सूजी आँखें ना दिखे। आज ना तुम्हारा अक्स है ना तुम्हारे अलफ़ाज़। 

Monday, September 10, 2012

वो टुकड़ा धूप का...


मैने सुबह उठते ही घर के सारे दरवाजे खिड़की खोल दिए थे, कुछ देर बाद ही तेज हवा घर से आर पार हो रही थी। हवा का पर्र्दों के साथ लुका-छिपी का खेल चल रहा था पूरे घर में, खिड़की और बॉलकोनी में लगे विंड चाइम भी हवा के साथ अठखेलियां कर रहे थे। तुम्हारा मूड उस दिन बहुत अच्छा था और मेरा खराब, पता नहीं उदासी लग रही थी उस सुबह में मुझे। तुम ऑफिस चले गए, मैने भी कुछ नहीं कहा था, ज्यादा बात भी नहीं की।
बेचैनी को समझ नहीं पा रही थी..किताबों के साथ बैठ गई दिल बहलाने सोफे पर ही बैठे आंख लग गई। उस दिन तुम जल्दी आ गए थे घर, मै चुप थी, तुमने भी मुझसे कुछ खास बात करने की कोशिश नहीं की। काफी देर हो गई थी अब, तुम्हे देखने बेडरूम की तरफ गई, खिड़की खुली थी, धूप का एक टुकड़ा अंदर झांक रहा था, लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर में टुकड़ा छोटा हो रहा था। तुम वहीं बेड पर खामोशी से बैठे थे, मै वहीं पास जाकर बैठ गई तुम्हारे...थोड़ी देर बैठे रहे दोनों...चुपचाप... तुम थोड़ी देर बाद उठे, तुमने अपना हाथ दिया और मुझे डांस के लिए बुलाया मै कुछ समझ नहीं पाई। तुम उसी धूप के टुकड़े पास ले गए मुझे जो धीरे-धीरे छोटा हो रहा था। अचानक मेरे कान में तुमने धीरे से कहा, हमें इसी टुकड़े पर डांस करना है ये जितना छोटा होगा, हम उतने ही पास होंगे। मै सिर्फ तुम्हें देख रही थी और उस धूप के टुकड़े को भी, लग रहा था मानों दोनों ने साथ में तैयारी की थी। अब टुकड़ा बहुत छोटा हो गया था और हम दोनों बहुत पास थे, एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे पहले कभी नहीं देखा हो। तुम अचानक बोले मुस्कुरा के जल्दी से बॉय बोलो इस धूप के टुकड़े को नहीं तो नाराज होकर कल आएगा नहीं....मैने देखा सच में एक लकीर भर थी अब जो किसी भी वक्त ओझल हो जाती...दोनों मुस्कुराए...वो टुकड़ा हमें साथ में छोड़कर चला गया था...

Tuesday, September 4, 2012

यही है सुकून

clicked by Mahi S, Jaipur flat
पता है सब उलझा हुआ है, कुछ ठीक भी नहीं होगा शायद अब लेकिन मै शायद बाद के लिए कोई अफ़सोस नहीं छोड़ना चाहती...समझती मै भी सब हूँ लेकिन फिर भी बस इतना जानती हूँ की एक ही ज़िन्दगी है, जो करना है बस कर गुज़ारना है। तभी तो सब इतना ख़राब चलने के बाद भी पहुँच गयी तुम्हारे पास पता था अच्छा कुछ भी नहीं होगा लेकिन दिल को सुकून रहेगा साथ तो थी...तुम्हारा जन्मदिन जो था कैसे नहीं होती साथ...
बुरा गुज़रा दिन....अब तक का सबसे बुरा शायद...कुछ यही सोचकर दिन गुज़र गया था....मै माफ़ी मांगने के लिए जैसे ही कमरे में गयी देखा तुम्हे सुकून से सोते हुए...कमरे में अँधेरा था...मैंने बालकोनी का दरवाज़ा खोला, आसमान बादलों से घिर आया था...बारिश मानो बादलों के कैद से छूटकर बेपरवाह होकर बरसने को बेताब थी ...बहुत खूबसूरत दिख रहा था आसमान आज...मेरा था वो...मेरा आसमान...मैंने फिर कमरे में देखा, तुमने करवट ली...बहुत आराम से...शायद यही एहसास जिसे मै जी रही थी उसे सुकून कहते हैं...तमाम मुश्किलों के बाद भी मैंने जीया उस सुकून को...तुम्हे देखेने का सुकून, तुम्हारे पास होने का सुकून!!!

Tuesday, August 28, 2012

आईने ने कैद किया अक्स


दिन गुजर रहे हैं अपनी रफ्तार से, वक्त है कि मेरे लिए रूक ही नहीं रहा है। आसपास से सब गुजर रहा है लेकिन मेरे लिए सब कुछ जैसे ठहरा है। कुछ खोई चीजों को ढूंढ़ते हुए इतना दूर निकल आई हूं कि रास्ता ही नहीं मिल रहा है बाहर निकलने का । किस्से पूछूं रास्ता? दूर चली जा रही हूं एक रौशनी के पीछे, छलावा है शायद वो, जितना आगे बढ़ रही हूं वो रौशनी उतनी ही आगे जा रही है। हथेली फैलाओ तो हाथ में है और हथेली बंद करो तो बाहर। थक गई हूं अब, और ये रास्ता है तो तय होने का नाम ही नहीं ले रहा है। दिन ढल रहा है, आज भी रास्ता नहीं मिला बाहर निकलने का! एक जगह लेकर बैठ गई हूं खामोशी से, एक उम्मीद के साथ। लेकिन थकी हुई आंखों को कुछ धुंधला अक्स दिख रहा है, हमारा-तुम्हारा अक्स, मुस्कुराते हुए आइने के सामने, कैद करते हुए कुछ खुश लम्हों को, खिलखिलाते हुए, एक दूसरे के साथ.... शायद आईने ने ही कैद कर लिया वो अक्स....बदमाश कहीं का...तभी तो आज आईने के सामने हूं तो थकी आंखे, खामोश चेहरा और आईने के भीतर वही रौशनी दिख रही है।

Tuesday, August 7, 2012

कहानी लिखने की एक कोशिश...


ये कहानी मैंने रचनाकार.ऑर्ग "कहानी लेखन प्रतियोगिता" के लिए लिखी है...

बन सकती थी मदीहा...

जनाजे के सामने जब वो पीले गुलाब लेकर पहुंचा और उसे रखने लगा तो मानो उसके कान में किसी ने आकर धीरे से कहा "तुम फिर फूल लेकर आए....मना किया था ना, तुम जब फूल लाते हो कुछ बुरा होता है।" कांप गया वो अंदर तक मानो मीहिका ने खुद उसके पास आकर ये शब्द दोहराए हो। वो खामोशी से वहां कुछ पल बैठना चाहता था, अकेले में, माफी मांगना चाहता था उससे, नहीं साथ दे पाया उसका।

 उसकी मां वहां बिलख-बिलखकर रो रही थी, पिताजी भी मां को संभाल रहे थे लेकिन उनके आंसू भी थमने का नाम नहीं ले रहे थे। भाई पास में खड़े थे, सब उसे ले जाने की तैयारी कर रहे थे लेकिन अंजान का दिल कह रहा था 'लौट आओ मीहिका, एक बार, इस बार आओगी तो जाने नहीं दूंगा तुम्हें।' इस गमगीन माहौल में उसका मन भारी हो गया था। रातभर सफर की थकान तो थी ही लेकिन मानसिक थकान उसे अंदर तक मार रही थी। मीहिका को अब उसके अंतिम सफर में ले जाने का वक्त आ गया था। सब उसे लेकर जा रहे थे, वो भी कहीं पीछे चल रहा था, बहुत दूर, सबसे अलग! कदम जैसे बढ़ नहीं रहे हो और आंखों के सामने पुराने दिन की तस्वीर! मीहिका का वही चहकता चेहरा, वही सपने देखती खूबसूरत आंखें, वो ही जिंदादिली...आज अंजान को मीहिका की हर छोटी बात याद आ रही थी, वो उसके हर रंग को थामना चाह रहा था लेकिन आज मीहिका आगे चल रही थी और वो उसके पीछे। वह जितना उसकी तरफ बढ़ रहा था मानो वो और आगे निकल रही थी। 

बहुत प्यार था दोनों के बीच में सब जानते थे। मीहिका तो इतना प्यार करती थी कि वो अंजान के लिए कुछ भी कर गुजरे। वक्त बहुत अच्छा चल रहा था। दोनों एक-दूसरे के साथ बहुत खुश भी थे। छोटी-छोटी खुशियों को दोनों ऐसे जीते थे मानो कल जिंदगी नहीं हो। आज अंजान को मीहिका की वो बात बार-बार याद आ रही थी जब वो कहती थी "कुछ मत छोड़ो करने के लिए कल का क्या भरोसा, वक्त से बड़ा धोखेबाज तो और कोई नहीं है। क्या पता आज हमारे पास अच्छे से है और कल वक्त का मन बदल जाए? तो अगर बारिश की बूंद भी आ रही है तो उसका जश्न ऐसे मनाओ जैसे करोड़ों की लौटरी लग गई हो। " उसका मन इन बातों को सोच-सोचकर और भारी हो रहा था। अब वो भी सबके साथ उस मैदान में पहुंच गया था जहां मीहिका को अंतिम विदाई दी जा रही थी। उसका दिल फट रहा था वो अब जोर-जोर से रो रहा था, उसके भाई ने अंजान को सहारा दिया और मीहिका के पास तक लेकर गया, उजले कपड़े में उसके चेहरे पर आज भी एक तेज नजर आ रहा था। अंजान उसे निहार रहा था, आखिरी बार, आज के बाद ना ही ये चेहरा दिखेगा ना ही वो चहक। अंतिम संस्कार की सारी विधि अब पूरी हो चुकी थी। सूरज ढल गया था, सब लौट रहे थे, वो उसके घरवालों के साथ नहीं गया। पैदल ही निकल लिया...बहुत दूर कहीं, अपनी मीहिका के यादों को लिए हुए।

देर रात तक इधर-उधर घूमा लेकिन उसे कहीं भी सुकून नहीं मिला। बेचैन मन पता नहीं क्या जानना चाह रहा था। आज उसे धूल के एक कण में भी मीहिका नजर आ रही थी, वही मीहिका जिसे छह महीने पहले छोड़कर वो दिल्ली छोड़कर चला गया था। आज उसे वो दिन भी याद आ रहा था जब उसने मीहिका को एक योजनाबद्घ तरीके से छोड़ा था, उसके घरवालों के साथ मिलकर। उसे याद है जब उसने मीहिका की मां, उसके भाई और पिताजी से बात की थी कि उसके घरवाले इस रिश्ते के लिए नहीं मान रहे हैं। कहीं न कहीं मीहिका के परिवार वाले भी इस रिश्ते के लिए राजी नहीं थे। लेकिन किसी के मन में किसी के लिए कड़वाहट नहीं थी। सब परेशानी समझ रहे थे, सिवाए मीहिका के। वो पहले उसे बहुत समझाने की कोशिश कर चुका था। लेकिन वो कोई बात मानने को तैयार नहीं थी। आखिर उसने मीहिका के घरवालों से बात करना ही ठीक समझा। उसने सबको बताया कि अब आखिरी तरीका है वो शहर छोड़ दे। वही बताने वो उस दिन मीहिका के घरवालों से मिलने गया था। उस दिन वो घर में नहीं थी, घर क्या शहर में ही नहीं थी। ऑफिस के काम के सिलसिले में चंडीगढ़ गई हुई थी। वो वहां पहुंचा और सबको बताया कि वह पुणे शिफ्ट हो रहा है। सबने आपस में बात भी की कि अचानक इस तरह से उसका चला जाना शायद मीहिका बर्दाश्त न कर पाए। लेकिन इसके अलावा और कोई उपाय भी नहीं था। उसने कहा कि वो कुछ दिन परेशान होगी लेकिन धीरे-धीरे उसे उसके बगैर रहने की आदत हो जाएगी। वो चला गया था उस दिन हमेशा के लिए शहर छोड़कर, प्यार उसे भी था लेकिन मजबूरी ऐसी कि वो उसका हाथ थाम ही नहीं पाया। 

पुणे पहुंचकर उसने मीहिका से एक दो दिन बात की लेकिन बातचीत धीरे-धीरे कम होती गई। दूरियों का मतलब वो भी समझ रही थी। इस तरह से दिन बीतने लगे थे। अंजान मीहिका की खैर-खैरियत किसी न किसी से ले ही लेता लेकिन उसने उस तक पहुंचने के सारे दरवाजे बंद कर लिए थे। नेटवर्किंग साइट में भी अब वो नहीं था। इन्हीं सब बातों को अभी सोच कि झटके से उसकी टैक्सी रूकी। वो एकदम चौंक कर उठा और देखा घर आ गया है। टैक्सी वाले को पैसे देकर घर की ओर चला। घर की घंटी बजाई तो उसकी मां ने दरवाजा खोला, मां कुछ पूछती उसके पहले ही वो  तेजी से अपने कमरे की तरफ चला गया। कमरा भी आज उसे काट रहा था, कमरे के हर कोने में मीहिका थी, खिड़की खुली थी और वहां से आ रही हवा से खिड़की पर लगा विंडचाइम बज रहा था। उसकी हल्की झनकार से उसकी धड़कनें और तेज हो रही थी। वो थका हुआ था लेकिन नींद नहीं आ रही थी उसे। वो उन सब चीजों को निकालकर बैठा था जो उसे मीहिका ने दी थी। उसने अपना लैपटॉप खोला और फेसबुक में जाकर मीहिका का प्रोफाइल देखने लगा। उसने उसकी एल्बम देखी और सब तस्वरों को एक-एककर देखने लगा। इतनी तस्वीरें कि देखते-देखते सुबह हो आई थी। थकान के कारण अब उसकी आंख लग आई थी। नींद से तब जागा जब उसकी मां कॉफी लेकर पहुंची। उसने तुरंत घड़ी देखी, साढ़े दस बज चुके थे। मां फिर बात करना चाह रही थी लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और तैयार होकर मीहिका की घर की तरफ निकल गया। 

उसके घर में पैर रखते ही उसके हाथ-पैर फिर ठंडे पडऩे लगे, घर के बागीचे में लगे फूलों को देखकर सोचने लगा कि ये सभी फूल मीहिका के लगाए हुए हैं लेकिन मेरी उसकी वजह से मीहिका को फूलों से ही डर लगने लगा था। शहर छोड़कर जाने के दिन भी मैने कोरियर से मीहिका के लिए फूल ही भिजवाए थे, उस दिन भी बहुत नाराज हुई थी वो फूलों को देखकर। वो ये मान बैठी थी कि जब मै उसे फूल देता हूं तो कुछ बुरा होता है। उस दिन भी तो उसके लिए बुरा ही था फूल के साथ उसे संदेश मिला था कि मै पुणे चला गया हूं। वो अभी बाहर खड़ा होकर फूलों को देख ही रहा था कि मीहिका के भाई ने उससे अंदर आने का आग्रह किया। उसने पूछा आंटी कहां है तो भाई ने ऊपर कमरे की ओर इशारा किया। वो कमरे की तरफ बढऩे लगा। अंदर पहुंचा तो देखा मीहिका की मां उसकी एक हंसती हुई तस्वीर लेकर बैठी हुई है। उन्होंने उसे बैठने के लिए कहा। अजीब सी खामोशी थी कमरे में, वो रो रही थीं। उसने कहा "मुस्कुराना बहुत पसंद था उसे, खुद को स्माइलिंग एंजेल कहती थी।" अब दोनों ही रो रहे थे। अंजान बोला आंटी आपने मुझे उसकी तबीयत को लेकर पहले क्यों नहीं बताया? कब से हुआ ये सब? उन्होंने कहा तुम्हारे जाने के बाद से ही वो खामोश रहने लगी थी, हंसना चहकना तो जैसे भूल ही गई थी। लेकिन बहुत समझाने पर सब धीरे-धीरे ठीक हो रहा था। हम उसकी शादी के लिए लड़का भी देख रहे थे, उसने भी शादी के लिए हां कर दी थी। लेकिन अचानक उसकी तबीयत बिगडऩे लगी। 

उस दिन बारिश से भीग कर आई थी, बहुत देर रात को, रो भी रही थी। बस अगले दिन से जो बुखार ने पकड़ा 20 दिन के अंदर वो अपने साथ ही ले गया। बेटा लेकिन आखिरी वक्त में उसने तुम्हें बहुत याद किया, हम तुम्हें बुलवाना चाह रहे थे लेकिन उसके पिताजी ने मना कर दिया और जिस दिन तुम्हें खबर दी  तब तक बहुत देर हो गई थी। लेकिन तुम्हारे लिए कुछ छोड़कर गई है वो, उसने कहा था कि तुम जरूर आओगे। उसकी मां उठकर गई और किताबों की शेल्फ के पास रखे पीले गुलाबों का गुच्छा ले आई, पीले गुलाब अब मुरझा गए थे। मीहिका को पीले गुलाब बहुत पसंद थे, उनके हाथ में एक लिफाफा भी था उसमें लिखा था छोटी सी ये जिंदगी...(वो हमेशा कहती थी एक किताब लिखेगी और उसका नाम होगा "छोटी सी ये जिंदगी") लिफाफे में एक खत था और एक पेन ड्राइव। उसने पेन ड्राइव निकाली और वहां कंप्यूटर टेबल पर जाकर कंप्यूटर पर चलाकर देखने लगा। उसमें इतने सालों की सब तस्वीरें थीं, करीब दो-तीन हजार तस्वीरें। वो बहुत जोर-जोर से रोने लगा, वो अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था। मीहिका की मां खड़ी थी, उसे हौसला दे रही थीं लेकिन दोनों के ही आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। आज फूल मीहिका ने दिए थे लेकिन खराब आज भी हुआ था, अब नहीं थी वो, हमेशा के लिए जा चुकी थी, बहुत दूर कहीं...अब वो मीहिका के डर को समझ पाया था क्यों फूलों से डरने लगी थी वो। उसने अब वो खत खोला उसमें लिखा था-

इसमें मेरी कोई गलती नहीं है कि मै एक मुस्लमान लड़की नहीं हूं। लेकिन मै सिर्फ तुम्हारे साथ एक खुशहाल जिंदगी चाहती थी, मै मीहिका से मदीहा भी बन सकती थी...लेकिन तुमने कोशिश नहीं की, जा रही हूं बहुत दूर....दुआ करूंगी अगले जन्म एक मुसलमान लड़की बनकर आऊं!


Sunday, August 5, 2012

इंशाल्लाह...

clicked by: Mahi S
Mahi : सुनो ना एक राइटिंग कॉम्पीटीशन है, उसमें लव स्टोरी लिखनी है, आखिरी तारीख अभी कुछ दिन में ही है प्लीज तुम लिखो ना हमारी कहानी...प्लीज...
S : हां हां ठीक है...मै कोशिश करूंगा...लेकिन अच्छा लिख पाऊंगा या नहीं ये नहीं पता।
Mahi :  तुम लिखो तो सही हमारी लव स्टोरी सबसे अच्छी होगी।
S : सबको ऐसा लगता है कि उनकी लव स्टोरी बेस्ट है। तुम भी ना...
Mahi :  मुझे नहीं पता तुम लिखकर जल्दी से मेल कर दो।
S : क्या लिखूं कि कहानी की हीरोइन ये मानने को ही तैयार नहीं है कि कुछ रिश्ते साथ रहने के लिए नहीं बनते??
Mahi : नहीं...वहीं से शुरू करो तुम्हारा ऑफिस..दीदी का डेस्क...उसकी शादी की तस्वीर और तस्वीर देखकर तुम्हारा मुझे एक अंजान बनकर फोन करना। :)
S : फिर परियों की दुनिया में दोनों का रहना और हकीकत सामने आने उसे न मानने की जिद करना...
Mahi : काश ऐसा हो कि जैसे-जैसे तुम्हारा पेन चले और कहानी सच में वैसी ही चले। और कहानी का अंत हो कबूल है..कबूल है...कबूल है... :) :)
बोलो ना अब इंशाल्लाह...अब तो तुम जल्दी से नहीं बोल रहे हो ;)

Thursday, August 2, 2012

Yes!! Its 2 August

I wish a bad life with you forever
 rather than a life like a queen with someone else 
So many beautiful years of togetherness

Sunday, July 29, 2012

क्या तुम्हें याद है?


मेरी हमेशा से समय से पहले पहुंचने की आदत और तुम्हारी हमेशा देर से आने की आदत...हर मुलाकात में तुम्हारे देरी की शिकायत और नाराजगी। तुम हमेशा कहते तुम देर से क्यों नहीं पहुंचती, लड़कियां तो हमेशा इंतजार करवाती है। तुम्हारे डांट के डर से कितना भी जल्दी करूं फिर भी तुमसे पीछे ही रह जाता हूं। ...लेकिन इतने सालों में भी मै तुम्हारी आदत नहीं सुधार पाई।
तम्हें याद है वो दिन जब हमें लंच के लिए मिलना था...और घर से निकलने से पहले मैने बार-बार कहा था कि आज देर मत करना वरना मै इस बार रेस्टोरेंट के अंदर नहीं बाहर ही इंतजार करूंगी चाहे कुछ हो जाए...और तुमने कहा था अरे जान फिक्र मत करो बस उड़कर पहुंचता हूं तुम्हारे पास...तय समय पर मै पहुंच गई...लेकिन तुम तो हमेशा की तरह गायब थे...मैने भी ठान ली थी आज अंदर तो जाना नहीं है चाहे कुछ हो जाए।
थोड़ी देर बाद आसमान में काली घटाएं छाने लगी तेज बारिश होने वाली थी...मुझे पहुंचे अब आधा घंटा हो चुका था...मैने फोन निकाला और मिलाया, सीधा पूछा कहां हो? अब मै निकल रही हूं। तुमने कहा बस पहुंच गया हूं तुम्हारे लिए कुछ लेने गया था। अब तेज बारिश शुरू हो गई थी...लेकिन जिद में मै बाहर ही खड़ी होकर भीग रही थी, इतने में तुम आए, और तुम्हारा रटा हुआ डायलॉग बहुत देर से इंतजार कर रही हो ना माही? गुस्सा तो बहुत आ रहा था, तुम भी इस बात को समझ रहे थे। मैने गुस्से में पूछा मेरे लिए कुछ लाने में देर हुई ना क्या लाए दो मुझे....तुम मेरा हाथ पकड़कर थोड़ा आगे चले मेरे बैग से छतरी निकालकर खोली और बोले देखो जितनी बारिश की बूंदें हैं ना इतनी खुशियां लाया हूं तुम्हारे लिए...अब गिन लो तुम...इतना सुनते ही मेरे चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई...क्या तुम्हें याद है अनगिनत बूंदों वाली खुशियां??

Wednesday, July 25, 2012

नीला आसमां सो गया...


सामान्य दिन से अलग थी कल की शाम, अजीब एकदम...खामोश! मै बार-बार उसका फोन मिला रही थी, एक बार भी कोई जवाब नहीं मिल रहा था। ऑफिस में भी फोन किया किसी को कोई जानकारी नहीं...मन डरा हुआ था, पूरा दिन गुजर गया था, एक बार  भी कोई बात नहीं। मौसम अपने हिसाब ने नर्म-गर्म हो रहा था....उसमें भी बेचैनी थी। मन जानता था क्या चल रहा है...कहीं न कहीं कई सालों से इस बात का अंदाजा था...लेकिन पागल है ना क्या करें मानना ही नहीं चाह रहा था। 
अभी उधेड़बुन में ही थी कि शाम की अजान सुनाई पड़ी। अब मुझसे और नहीं रहा जा रहा था। घर में कोई नहीं था, बार-बार फोन मिलाकर मेरी अंगुलियां भी थक रही थीं। आसमां गहरे नीला रंग ओढ़े फैला हुआ था, अब बाहर अंधेरा था। मेरी नजरें अब भी फोन पर थीं लेकिन फोन ने भी जैसे खामोशी पी ली हो...मन में इतनी बेचैनी, गुस्सा भी..क्या एक फोन नजर नहीं आ रहा? अब मै किताबों से मन बहलाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन एक भी अक्षर पर नजर नहीं ठहर रही थी। दिल की धड़कन इतनी तेज कि मानो अभी बाहर आ जाएगा दिल। फोन बजा...मेरा सीधा सवाल मेरा एक भी फोन नहीं दिखा? शायद उसे मेरा एक शब्द नहीं सुनना था...और कहा...मान जाओ...सब बिखरने से पहले मान जाओ..तुम्हारे अकेले की कोशिश से परंपराएं नहीं टूटेंगी...शाम की खामोशी मुझे अब समझ आ रही थी, एक गहरी बात लिए वो खामोशी मेरे सामने थी...नीला आसमां भी अब सो चुका था...

Monday, July 16, 2012

भीग रही थी यादों में...

clicked by: Mahi S 
तेज़ बारिश मानो मुझे अपने साथ कहीं ले जाना छह रही थी...बहुत दूर कहीं...छाता था साथ में, लेकिन बारिश की बूंदे उन दिनों के एहसास को जीने कह रही थीं. सच ही तो तेज़ हवाओं और आसमान से बरसते पानी ने सब कुछ याद दिला दिया. तुम्हारे साथ बारिश में भीगना।..जानबूझकर तेज़ बारिश में कार से बहार निकलना और मुझे भी बारिश में खींचना...घर की बालकोनी में खड़े होकर उजले आसमान को देखना और एक दुसरे की और देखकर बिना बोले ही मुस्कुराना...तुम्हारे बार बार ऑफिस से निकलने की जिद करना और मेरा कहना की कैसे आऊं बॉस मौसम की भाषा समझता ही नही है...फिर भी तुम्हारा घंटों ऑफिस के बहार मेरे लिए इंतज़ार करना..मेरे आने पर सीसीडी में साथ बैठकर कॉफ़ी पीना...घर लौटे वक़्त इंडिया गेट में हाथों में हाथ डाले टहलना और ठंडी हवा क बीच एक ही भुट्टे को खाना...कुछ ख़ास तो था उन दिनों में.....

और आज....

बारिश भी वहीँ है हम-तुम भी वही लेकिन बारिश की बातें महज़ एक sms से हो जाती है...फोन करके  थोड़ी बात...या फिर मेरे फोन करने पर तुम्हारा कहना थोडा बिजी हूँ अभी तुम्हे फोन करता हूँ।..और बाद में जब तुम्हारा फोन आता भी है तो बारिश की वो ठंडक उमस बन चुकी होती है....न तो वोह बालकोनी है न तुम दिल्ली में...तुम्हारा कहना ठीक है वक़्त क साथ रिश्ता मज़बूत होता है...चीज़ें बदलती हैं, गंभीर होती हैं...लेकिन मेरे लिए तो वक़्त वही था...बारिश.. इंडिया गेट.. कॉफ़ी.. इंतज़ार..भुट्टा...बालकोनी...कुछ तो ख़ास था उन दिनों में...या तो वक़्त ख़ास था या फिर बारिश!!!

Sunday, July 15, 2012

खूबसूरत ख्वाब



Beautiful Venice
कितना खूबसूरत शहर है ना शारिक...बोला था तुमसे कुछ खास है इस जगह में तुम मान ही नहीं रहे थे। ऐसे-ऐसे इसे रोमांटिक शहर नहीं कहा जाता है...गंडोला में बैठकर वेनिस की शाम मानों और खूबसूरत दिख रही थी, एक-दूसरे का साथ वक्त को और खूबसूरत बना रहा था। पानी में तैरता ये शहर न जाने कितनी ही बातें कर रहा था। हम दोनों गंडोला में सवार पता नहीं कितनी ही दूर निकल आए थे...मै बीच-बीच में शहर की जानकारी दे रही थी। अब हम वेनिस का सनसेट देख रहे थे..पानी के ऊपर नाव में डूबते सूरज का नजारा अद्भुत था...समझ आ रहा था इसकी खूबसूरती के इतने चर्चे क्यों है...इस शहर का सबकुछ खास। वेनिस के सफर ने हम दोनों का मानों और करीब कर दिया था...पानी की चादर ओढ़े यह शहर मानों हर प्यार करने वालों के स्वागत के लिए खड़ा था....



तेज रिंग टोन की आवाज कुछ परेशान कर रही थी...दो बार अनसुना किया लेकिन फिर भी...उफ!!! ओह....ये क्या फोन तो शारिक का बज रहा है और मै वेनिस नहीं अपने कमरे में थी...गंडोला में बैठे वेनिस में शाम की ठंडी हवा का लुत्फ नहीं बल्कि मेरे कमरे की एसी की ठंडक थी :P :P.....उठकर इतनी जोर से हंसी आई :) :)...फोन मिलाया साहब को, बताया खूबसूरत ख्वाब और उनका जवाब माही...तुम और तुम्हारे ख्वाबों की दुनिया... मैने आंख बंद की और चुपचाप ऊपरवाले से कहा...छोटा सा ख्वाब है वेनिस का सफर साहब के साथ..... Plzzzzz :D

Friday, July 6, 2012

बर्थ डे :D :D

my cake 
किसी भी छोटे बच्चे की तरह मेरे अंदर भी बर्थडे को लेकर खास एक्साइटमेंट रहता है। बता दूं कि मेरा बर्थडे हाल ही में गया है। 21 जून को Smiling Angel दुनिया में आई थी। :) :)
 एक महीने पहले से बर्थडे की तारीख गिनना, बर्थडे के लिए खास ड्रेस, मेरी पसंद का बर्थडे केक जो घरवाले लाते हैं, मम्मी का बनाया हुआ मेरी पसंद का खाना, एक रात पहले आधी रात को आने वाले सबके फोन और मेरा फोन पर खुश होकर सबको थैंक्यू थैंक्यू कहना....ये सब बचपन से लेकर अब तक चल रहा है और मेरे एक्साइटमेंट में कहीं कोई कमी नहीं आई। :) :) 
@ water park
इस बार भी गिनती उल्टी शुरू की, सब हुआ लेकिन पिछले कुछ सालों की तरह साहब से ठीक बर्थ डे से पहले छोटी बात को लेकर खटपट ने मूड का कबाड़ा कर दिया। बात छोटी थी कि तुम 20 जून को ही दिल्ली आओ और उसका कहना था कि अम्मी-अब्बी आए हैं तो मै 21 को ही आऊंगा उसी दिन साथ रहेंगे। बस अब क्या था आधा एक्साइटमेंट तो चला गया था। गुस्से में मैने 20 की रात को मोबाइल फोन भी बंद कर दिया, लैंड फोन की भी तार निकाल दी। गुस्सा उससे बात किसी से नहीं। :(
खैर रात के 12 बजते ही मेरी नाक को मेरे फेवरेट केक की खुशबू लग गई, हर साल इंतजार करती थी इस साल झगड़े में भूल ही गई कि मेरा केक घर में आ चुका है। खूब हल्ला हंगामे के साथ मां, पापा, भइया और मेरा ममेरा भाई केक के साथ खड़े थे। अचानक चेहरे पर मुस्कान आ गई। फोन बंद ही था, बहुत घंटे बाद जब ऑन किया तो देखा बर्थडे मैसेज के अंबार लग गए थे, उनमें से एक शारिक साहब का भी था, साथ में लिखा था सुबह जल्दी घर से निकलकर गुडग़ांव आ जाना मै वहां पहुंच जाऊंगा। मन तो किया कि ना जाऊं लेकिन दिल को क्या समझाती। ऑफिस से भी छुट्टïी ले ली थी, सुबह घर से जल्दी निकली और कनॉट प्लेस पहुंच गई। वहां मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी पहुंची, उसे भी मैने गुडग़ांव साथ चलने कहा। हम गुडग़ांव पहुंचे, शारिक भी पहुंच चुका था, गुस्से में थी लेकिन उसे देखकर हंसी नहीं रूकी। खैर, जून में बर्थ डे होने की शिकायत शारिक को हमेशा रहती है और मेरा जवाब होता है इसमें मै क्या करूं? :P :P 
my favourite chinese food
तो जून की सड़ी गर्मी में हम लोगों को बर्थ डे सेलिब्रेट करने की सबसे अच्छी जगह वाटर पार्क लगी, हम तीनों थोड़ी देर में फन एंड फूड विलेज पहुंच गए। वहां जाकर कॉस्ट्यूम लिया और थोड़ी देर में वॉटर पूल में उतर गए। तेज म्यूजिक चल रहा था, शारिक ने मुझे अचानक अपनी तरफ खींचा, मेरे कानों के पास आकर बोला माही... हैप्पी बर्थ डे...मै मुस्कुराई...अचानक सोचा रात से न जाने कितने लोग ही फोन कर रहे हैं लेकिन ये एक विश इन कुछ सालों में कितनी खास बन गई है। :) 
शाम तक वहां जमकर मौज मस्ती करने के बाद हम लोग डिनर के लिए एमजीएफ मॉल पहुंचे। डिनर चाइनीज करना था तो हम यो चाइना चले गए, वहां बैठते ही याद आया कि मैने पिछले साल भी डिनर यो चाइना में ही किया था लेकिन जयपुर में...

Tuesday, May 29, 2012

मुझे एक परियों की कहानी दे दो ना


माही परियों की कहानी से बाहर आओ...हकीकत को थोड़ा समझो, सब तुम्हारी परियों की कहानी की तरह हुआ, हम एकदूसरे से मिले, साथ रहे, इतना अच्छा वक्त बिताया, हमने बड़ी कार ली, इतना बड़ा घर लिया लेकिन कुछ चीजें तुम्हारी कहानी के हिसाब से नहीं होंगी। हम दोनों ने इसके लिए भरपूर कोशिश कर ली है, नतीजा तुम देख चुकी हो....कुछ फैसले हमारे हाथ में नहीं होते, कुछ अनचाही बातें जिंदगीभर साथ चलती है...मै खामोशी से उसकी बात सुन रही थी, वो परेशान था, हर दिन मुझे नए तरीके से ना जाने क्या समझाने की कोशिश करता है जो कि मुझे समझना ही नहीं है। मैने चुपचाप सब सुना फोन रख दिया...
उसकी कही एक-एक बात मेरे जहन से नहीं उतर रही थी, ऐसा लग रहा था मानो कह रही हो इस बारे में सोचने को। मुझे बस याद आ रहा था जब गाड़ी छोटी थी, पास में अपना घर नहीं था लेकिन उन दिनों हमारे पास खुशियां बड़ी-बड़ी थी। बारिश की बूंदों में एक दूसरे का इंतजार करने में भी खुशी थी, रूठना-मनाना भी जैसे कितना खास कुछ होता था लेकिन अब...मै पता नहीं क्या सोच रही थी, बाहर तेज धूप थी, गर्म हवाएं चल रही थी, मै अपनी धुन में चल रही थी, उसी सीसीडी की तरफ जहां मै अक्सर जाती हूं, अकेले...थोड़ी देर बाद फोन बजा, शारिक था...तुम बात करो माही, तुम्हारी खामोशी से डर लगता है, तुम चिल्लाओ लेकिन फोन मत रखो। लेकिन मुझे कुछ बात नहीं करनी थी, गुस्सा भी नहीं आ रहा था, मैने फोन नहीं काटा।
वो समझ गया था कि उसकी बात से मेरा मन उदास हो गया है। लेकिन अब वो हंसाने की कोशिश कर रहा था, हमेशा की तरह, पर मेरा मन अब उदास हो गया था। उसकी बातें मेरे दिमाग में चल रही थीं, अचानक शारिक मुझसे पूछा अच्छा माही बताओ मै वीकएंड में आ रहा हूं बोलो तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं? मै पहले बहुत देर चुप थी लेकिन फिर मै बोली मुझे एक परियों की कहानी दे दो ना!!!

Friday, May 11, 2012

वो दिन...


तेज हवा चल रही थी, हम दोनों अपनी पुराने सोसायटी शिप्रा सनसिटी में गाड़ी लगाकर वॉक कर रहे थे। मुझे लगा उसने गाड़ी सोसायटी में लगाई मॉल जाने के लिए क्योंकि उससे पहले बहुत झगड़ा हुआ था। लेकिन उसने गाड़ी सोसायटी में लगाने के बाद मुझे साथ लेकर उसी बिल्डिंग की तरफ चलने लगा जहां हमारा फ्लैट था। दोनों चुपचाप चल रहे थे...खामोशी से... जैसे-जैसे हम सोसायटी में बढ़ रहे थे मेरी आंखों में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। शारिक बोला जब हम यहां थे तो वक्त कितना अच्छा था, दोनों एक दूसरे से मिलने का इंतजार करते थे, घूमते थे, हंसते थे और आज वक्त कितना बदल गया... आज एक-दूसरे की ओर देखते ही लग जाता है कि फिर एक घंटा झगड़ेंगे। मै चुप थी...कुछ नहीं बोल रही थी...बाहर तेज आंधी थी, तेज हवा चल रही थी, वैसा ही तूफान मेरे अंदर भी  चल रहा था।
दोनों चलते हुए अपने में ही खोए थे, दोनों ही उसके हर कोने को देखकर पुराने दिन याद कर रहे थे, अचानक वो ठिठका, मेरी नजर बिल्डिंग पर पड़ी मौलसिरी 6.... अंदर की हलचल मानो बाहर निकलने के लिए और बढ़ रही थी। हम दोनों ऊपर जाने लगे, ठीक अपने पुराने फ्लैट के पास आकर रूके...उसके दरवाजे को छुआ, फिर छत की तरफ बढऩे लगे। छत पर पहुंचकर उस कोने को देखकर मै खुद को नहीं रोक पाई... वो वही कोना था जहां हम शाम की चाय पीया करते थे, सर्दियों में धूप सेंका करते थे। मै रो रही थी, बुरी तरह से, जैसे पता नहीं मेरी जिंदगी से क्या गया हो...शायद सब कुछ...शारिक भी वहीं था, जब खुद को संभाला तो देखा आंखे उसकी भी नम थी...

Tuesday, April 17, 2012

सही गलत के पार

बस चलती जा रही हूं, सही गलत के पार, ना जाने कौन सी दुनिया में। सब एहसास है लेकिन बेबस हूं, दिल कम्बख्त बहुत खराब है, मानता ही नहीं है, मजबूत होने ही नहीं देता। अब तो सोचना ही छोड़ दिया है, बढ़ रही हूं, कोई ना कोई जगह तो होगी जहां सब मेरे लिए अंत लिखा होगा। बस उसी जगह पहुंचकर देखूंगी क्या पाया क्या खोया। सही-गलत की पार की वो दुनिया कितनी सही होगी इसका हिसाब उसी दिन लगाऊंगी। लेकिन उस जगह पहुंचकर बस एक ख्वाहिश रहेगी मन में कि जिसका-जिसका दिल दुखाया है उन सभी से एक बार माफी मांग लूं। आखिरी बार, फिर बढ़ चलूंगी उस अंधेरी अकेली दुनिया में... 

Thursday, April 12, 2012

मै चाहती हूं क्षितिज को थामे रखना

दिल्ली में बेमौसम बरसात पता नहीं क्या बताना चाह रही थी, ठंडी हवा, रिमझिम बूंदें, चेहरे को छू रही थी तो मानो कोई ख्याल आंखों के सामने से होकर गुजर रहा हो । अजीब हलचल थी मौसम में भी और मेरे अंदर भी... मौसम में हलचल क्या इशारा कर रहे थे नहीं समझ पाई, लेकिन हमेशा से मेरा मन ये मानता है जब भी बारिश होती है या तो ऊपरवाला या बहुत खुश होता है या बहुत उदास। कल पता नहीं किस बात का इशारा था! हलचल के बाद आसमान  साफ़  हो गया था, एकदम उजला,  शाम को ऑटो में बैठी इन्हीं ख्यालों में उलझी थी कि नजर क्षितिज पर पड़ी, सूरज लाल था, अपनी लालिमा से जैसे जिंदादिली का संकेत दे रहा हो, ढल रहा था, मानो क्षितिज से कह रहा हो कि मुझे थामे रखो। सूरज  के साथ  क्षितिज  खूबसूरत दिख  रहा था, शायद अकेले होने पर न क्षितिज खूबसूरत  लगता ना ही सूरज! थामे रखना मै भी चाहती हूं, हर लम्हे को, हर पल को, जिंदगी को! लेकिन खोता हुआ दिख रहा है, मन की हलचल या हकीकत नहीं पता लेकिन फिलहाल तो उसके एक फोन के इंतजार में हूं, देश से बाहर है, बहुत दूर...